जीवन माँ से प्रारंभ होकर माँ को समर्पित

हम सभी यहाँ संसार में एक खोजी की भुमिका निभा रहे हैं.हम कुछ ना कुछ नित्य नवीन ज्ञान या भौतिक संपत्ति की लालसा से एक विज्ञानीय की तरह ऐक अन्वेषण एक खोज कर रहे हैं जिसमें भौतिक सुख और आत्मिक आनंद हमारा केन्द्र बिंदु है॥

इस संसार में माँ हमारा आधार है. माँ हमारा कर्ण है.माँ कर्णाआधार है॥ हम तो ईक लंब की तरह संपूर्ण जीवन सुख व आनंद की चाहत में खोजी बनकर जीते हैं। माँ के गर्भ से प्रारंभ यह जीवन अंततः माँ (प्रकृति) में विलीन हो जाता है॥

जीवन में माँ का महत्व

माँ बसुन्धरा के गर्भ से उत्पन्न पत्थर शिला जब किसी भावुक कलाकार के हाथों की प्रेम और करुणा से भरी चोट खाकर मुर्ति में प्रगट होने पर म से माँ त्री से प्रकृति के तीनों स्वरूप परिलक्षित होते हैं॥

किसी मुरत की प्रतिमां भी प्रति याने छाया और माँ का ही स्वरूप है॥ जीवन का सार ही माँ है. हमारी जननी ने जन्म दिया. माँ बसुन्धरा ने हमारा भरण पोषण किया.अन्ततः माँ प्रकृति हमें अपनी गोद में आचल की छांव में आश्रय देतीहै॥

ईसलिए सर्वप्रथम संसार में माँ का दर्जा प्राप्त है॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव
त्वमेव विद्या च द्रवीणं त्वमेव
त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
ऊँ नमः शिवाय

मैं अपनी आत्मिक जानकारी अनुभव एवं अनुभूति के आधार पर एक विचारशक्ति से यह प्रस्तुत कर रहा हूँ.
सत्गुरु हमारे मार्गदर्शक होतेहैं.
हमारा मार्गदर्शन करते हैं.
लेकिन उनके द्वारा बताये सत्मार्ग पर हमे ही चलना पड़ता है.

भक्ति मार्ग का प्रारंभ भी मां से ही होता है. किसी भी कर्मकांड के प्रारंभ में श्री गणेशजी का आह्वान कर माँ बसुन्धरा का भाव से पुजन कर प्रार्थना करतेहै.

माँ हमारा कोई भी आसन नहीं है. हम आपकी गोद में बैठ कर उस परम सत्ता को नमन करते हैं.जो सर्व कल्याण कारी है.
हमारा ध्यान सदैव श्री चरणों में रहे,
हमारे सारे कर्म आपको समर्पित है ,
हमारे सारे कर्मो का फल शिव हो अर्थात सर्व कल्याणकारी हो,
अन्ततः माँ आदि शक्ति हमारी आत्मा को समर्पित कर रहा हूँ।

ऊँ नमः शिवाय
शिवांश

SOCIAL MEDIA पर जानकारी शेयर करे

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *